paralysis in kids in hindi

बच्चों में लकवा होना : Paralysis in Kids Childrens in Hindi

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paralysis in kids in hindi

जानिए बच्चों के लकवा रोग के बारे में, बच्चों में लकवा क्यों और कैसे होता हैं आदि पूरी जानकारी.

यह भी मेरमज्जा प्रदाहजन्य रोग हैं. यह रोग अधिकतर 6-7 माह की आयु से लेकर 3 से 4 साल के बच्चों को हो जाता हैं. इसके प्रारंभिक लक्षणों में सबसे पहले बच्चे को ज्वर बुखार आता हैं. जिसे अगर उत्तेजित या विषैली औषधियों से दबाने की कोशिश की जाती हैं तो वे औषधियां मेरुमज्जा में प्रदाह उतपन्न कर देती हैं. फिर रोगी को आक्षेप झटके लगते हैं, जो 24 घंटे में पूरी तरह से बाल पक्षाघात में बदल जाता हैं. कभी कभी आक्षेप उग्र रूप धारण करके बहुत शीघ्र पक्षाघात लकवा का रूप ले लेता हैं.

इस रोग में तापमान 100 से 103 डिग्री तक बढ़ जाता हैं. यह देखा गया हैं की अगर इस रोग का आक्रमण बच्चे के वामांग पर होता हैं तो रोगी का रोग ठीक नहीं हो पाता और वह जल्द ही मर जाता हैं paralysis in kids childrens in Hindi.

कुछ डॉक्टरों का कहना हैं की इस व्याधि में एक तरह के सूक्ष्म कृमि सुषुन्मा काण्ड में प्रविष्ट होकर उसे खा जाते हैं. तब वहां की सूक्ष्म नाड़ियां और मांसपेशियां व्याघात पाती हैं. परिणामत: वे क्रियाहीन हो जाती हैं और भयंकर बाल पक्षाघात रोग को जन्म देती हैं.

एक विचारक के अनुसार यह रोग बालक के जन्म के कुछ ही दिन बाद, निर्बलता सहित मलावरोध होने पर, उसके भुजदंडों में हो जाता हैं, जिससे वह अपने हाथ हिला डूला नहीं सकता. यह छूत का रोग माना जाता हैं. इस रोग के विषाणु नाक या मुख द्वारा शिशु शरीर में प्रविष्ट होते हैं.

मक्खियों आदि द्वारा भी इसका संक्रमण खाद्य पदार्थों के द्वारा एक शरीर से दूसरे शरीर में हो जाता हैं. इस रोग के कीटाणु प्रारम्भ में रक्त में और फिर प्राय: एक सप्ताह में ही ज्ञान तंतु समूह में पहुँच जाते हैं और रोग अकस्मात प्रकट हो जाता हैं.

लड़कियों की अपेक्षा लड़कों पर इस रोग का आक्रमण प्रबलता से होता हैं. ग्रीष्म और शहद ऋतुओं में यह रोग अधिक होते देखा गया हैं. भारत की अपेक्षा पाश्चात्य देशों में यह रोग अधिक व्यापक हैं. जब बच्चे को यह रोग होने का होता हैं तो पहले जोर का सिर दर, कंठ में पीड़ा, हाथ पैरों और पीठ में दर्द और मांसपेशियों में ऐंठन होकर आक्षेप होता हैं. कभी ज्वर भी रहता हैं, नाक भी बहती हैं.

कभी-कभी नाक से रक्त भी आ जाता हैं. गर्दन दुखती हैं, फिर टांगों में लकवा मार देता हैं. नींद में व्याघात पहुँचता हैं. बेचैनी बढ़ जाती हैं.

इस रोग से आक्रांत कुछ रोगी बच्चों को ज्वर, फिर वमन, जाड़ा, सिर का भारीपन आदि होकर हाथ पैर क्रियाहीन हो जाते हैं. गले में कड़ापन आ जाता हैं, पीड़ित स्थान की त्वचा का रंग लाल या गुलाबी हो जाता हैं. मांसपेशियों का आक्षेप होकर हाथ की अपेक्षा पैर पर रोग का अधिक आक्रमण होता हैं.

ज्वर 100 से 103 डिग्री तक बढ़ जाता हैं. आँखों से एक ही जगह दो चीजें दिखने लगती हैं. ऐसे लक्षणों से युक्त रोगी बच्चे अधिकतर 10 से 20 प्रतिशत नहीं ठीक होते और कालकवलित हो जाते हैं.

बच्चों में मुंह का लकवा

जब रोग का आक्रमण बच्चे के मुख पर होता हैं तो एक और का मुख, आंख तथा जबड़ा टेढ़ा हो जाता हैं. मुंह और आंख ठीक तौर से बंद नहीं होते. जब हाथ पैर पर आक्रमण होता हैं तो वहां नसों का रक्त संचार एकदम बंद हो जाता हैं, जिससे बालक चल फिर नहीं सकता और न कुछ काम ही कर पाता हैं.

कभी कभी हाथ पैर आदि में चुटकी काटने पर भी बालक को उसका बोध नहीं होता. बालक पैर पर खड़ा नहीं हो सकता. उसके हाथ पैर झूलने लगते हैं. इस रोग में अधिकतर बालक के मुख का आधा भाग या एक हाथ या पैर या एक और के दोनों हाथ पैर निकम्मे हो जाते हैं, बालक दीनता का भाव दर्शाते हुए दिन रात रोते रहता हैं. यह आवश्यक नहीं हैं की जिस बच्चे को यह बीमारी हो, वह कुछ विशेष लक्षण दिखाए ही.

एक साल से कम आयु के बच्चे को यह रोग बहुत कम होता हैं, क्योंकि छह महीने तक तो माँ से मिली प्रतिरोधक शक्ति इस रोग से बच्चे की रक्षा करती रहती हैं.

इस रोग के बारे में अन्य तथ्य यह हैं की पाश्चात्य देशों में यह रोग बड़े बच्चों को और वयस्क लोगों को अधीक होता हैं. अर्धविकसित देशों में यह छोटे बच्चों को होता हैं. कारण अर्धविकसित देशों का वातावरण स्वास्थ्य की दृस्टि से अच्छा नहीं होता हैं. फलतः वहां पर इस रोग के छोटे छोटे हमले होते ही रहते हैं. ये छोटे छोटे हमले बच्चों को बीमार बनाने के बजाय, उनके शरीर को इस योग्य बना देते हैं की वे इस हमले को सह सकें.

पर विकसित देशों में स्थिति दूसरी ही हैं. वहां वातावरण स्वास्थ्य के लिए काफी अच्छा होता हैं. इसलिए इस तरह के छोटे मोटे हमलो का प्रश्न ही नहीं उठता. जब कुछ बड़ी आयु में आने पर यह हमला होता हैं, तब उनका शरीर उसका सामना करने के लिए तैयार नहीं रहता और वे रोग के सम्मुख पराजित हो जाते हैं.

पश्चिमी देशों में यह रोग अति भयावह समझा जाता हैं, क्योंकि इसके बुरे परिणाम से बालक के अंगों और हड्डियों में कुरूपता आ जाती हैं और वह लंगड़ा तथा लूला हो जाता हैं.

कहते हैं की बाल लकवा (बच्चों का लकवा) रोग का आरम्भ सं 1886 से हुआ हैं. सं 1904 में यह रोग नार्वे में संक्रामक रूप से फैला हुआ था. बालकों का यह भयानक रोग यूरोप और अमेरिका में अधिकतर संक्रामक रूप धारण कर लेता हैं, किन्तु रूस में इसका संक्रामक रूप आज तक देखने को नहीं मिला. प्रोफ़ेसर सेवन के मत से बाल लकवा एशिया महाद्वीप में विदेशों से आकर फैला हैं.

बाल लकवा दो तरह का होता हैं

पक्षाघात सहित (paralytic)
पक्षाघात रहित (Non paralytic)

इसके दो और प्रकार हैं जो काफी भयंकर होते हैं:

बल्बर : यह सर्वाधिक भयंकर प्रकार का बाल लकवा हैं इसमें बोलने और भोजन करने में काफी कष्ट होता हैं.

रेस्पिरेटरी : यह श्वास सम्बन्धी मांसपेशियों की प्रभावित करता हैं, बल्बर पोलियो भी कहते हैं.

ग़नीमन इतनी ही हैं की बच्चों का लकवा के दोनों प्रकार बहुत कम बालकों में होते हैं. बाल लकवा अधिकतर अन्य अंगों या पेट की मांसपेशियों को ही प्रभावित करता हैं.

वैज्ञानिक और डॉक्टरों का यह भी मत हैं की जिस बालक को एक बार बाल लकवा होकर ठीक हो जाता हैं, उसे जीवनमें फिर कभी यह रोग नहीं होता हैं.

बच्चों का लकवा एक विषाणु या कुछ ओर

एलोपैथिक में बाल लकवा का कारण एक विशेष प्रकार का विषाणु वायरस माना जाता हैं, जो बाहर से शरीर में प्रवेश कर जाता हैं और बाल लकवा उत्पन्न हो जाता हैं. पर, प्राकृतिक चिकित्सकों का मत इससे सर्वथा भिन्न हैं. प्राकृतिक चिकित्सा के दृष्टिकोण से इस रोग वास्तविक कारण विषाणु न होकर, शरीर के भीतर स्थित विजातीय द्रव्य हैं. भीतर और बाहर की गंदगी के कारण ही यह रोग उतपन्न होता हैं.

शरीर में कुछ विटामिनो और खनिज लवणों की बहुत कमी भी इस रोग का एक कारण हैं. हम जो भोजन करते हैं, उसी के द्वारा हमारे शरीर को विटामिनो और खनिज लवणों की प्राप्ति होती हैं. लेकिन गलत खानपान से शरीर इनसे वंचित रहता हैं. फलतः शरीर रोगी हो जाता हैं.

बच्चों के लकवा से बचने के लिए यह न खाये

सफ़ेद चीनी, चाय, कॉफ़ी, मिर्च मसाले अधिक पानी, तली भुनी चीजें, अचार, खटाई, केक, बिस्कट आदि गलत खान पान हैं. वे तत्वहीन होते हैं. इनसे ही रोग पैदा होता हैं, फिर चाहे वह बाल लकवा हो या अन्य कोई रोग.

गलत खान पान से शरीर की जीवनी शक्ति का हास होता हैं, उसी से मेरुदंड की नाड़ियां , जो बांहों और टांगों का सञ्चालन करती हैं, विजातीय द्रव्य से परिपूरित होकर निष्क्रिय बनती हैं. ऐसा देखा गया है की बच्चों को बाल लकवा होने से पहले उपयुक्त गलत खान पान पर ही पाला जाता हैं.

कबूतरों और चूहों आदि को जब इस तत्वहीन और गलत खान पान पर रखकर देखा गया तो इस प्रकार के भोजन के फलस्वरूप उनमें कुछ सप्ताहों में ही बाल लकवा के सारे लक्षण दृश्टिगोचर होने लगे. उसके बाद उन्हें सही खान पान देना आरम्भ किया गया, तो वे तेजी से स्वस्थ होने लगे और थोड़े ही दिनों में पूर्णरूप से स्वस्थ हो गए.

अमेरिका के प्रसिद्द डॉक्टर बेंजामिन पि. सेंडलर बाल लकवा के रोगियों को इसलिए प्राकृतिक और सही भोजन पर रखने के पक्ष में हैं. उन्होंने केवल ऐसे ही भोजन पर रखकर सं 1949 में उत्तरी कैरोलिना की जनता में बाल लकवा के रोग को बहुत कम कर दिया था.

डॉक्टरों सेंडलर ने अपने अनुभव से यह सिद्ध किया हैं की तत्वहीन भोज्य पदार्थों के निरंतर सेवन से बाल लकवा का प्रकोप प्रायः निश्चित सा रहता हैं. ऐसे पदार्थों के सेवन से शरीर में आवश्यक विटामिन तथा खनिज लवण नहीं पहुँच पते, जिसके कारण मनुष्य कितने ही भयानक रोगों का शिकार बन जाता हैं. ऐसे रोगों में बाल लकवा रोग भी हैं.

तो बाल लकवा बच्चों के लकवे से बचने के लिए बताये गए सभी उपाय पर जरूर ध्यान दें.

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Submitted : DR. Sudip Mehta (Ayurvedic)

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2 Comments

  1. BABA
  2. manish

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