लकवा का आयुर्वेदिक उपचार, पैरालिसिस का इलाज, lakwa ka ilaj, paralysis treatment in hindi, लकवे का उपचार

लकवा का इलाज – 101% Ayurvedic Paralysis Treatment in Hindi

पक्षाघात (paralysis) एक बहुत भयानक बीमारी / रोग हैं जो की हस्ती खेलती जिंदगी में रोड़ा बन जाती हैं. हम यहां आपको पैरालिसिस लकवा का इलाज आयुर्वेदिक घरेलु उपाय व नुस्खे के जरिये बताएंगे, साथ ही वह सब कुछ बताएंगे जो की लकवे का उपचार इन हिंदी में करने में फायदेमंद हो. हमारा मत हैं की अगर रोगी एक सही जीवनचर्या जिए तो वह लकवा बीमारी रोग को मिटा सकता हैं वह भी रामबाण इलाज कर के जो की हम यहां बताने वाले हैं attack of paralysis treatment in Hindi language with ayurvedic home remedies.

यहां हम आपको प्राकृतिक व आयुर्वेदिक इलाज इन हिंदी में बताएंगे, साथ ही लकवा की जानकारी को पूरी डिटेल में बताएंगे इसलिए यह लेख थोड़ा बड़ा हैं, इसलिए आप आराम से व ध्यान से आयुर्वेदिक व प्राकृतिक उपाय का यह जानकारी पढ़ें paralysis attack cure in ayurveda Hindi में.

Quick Info – हमारे शरीर का नियंत्रण मस्तिष्क के हाथों में होता हैं, जब मस्तिष्क की धमनी में किसी भी रुकावट के वजह से शरीर के किसी भी हिस्से या अंग तक खून नहीं पहुंच पाता हैं तो शरीर का वह अंग निष्क्रिय हो जाता हैं, यानी फिर वह कोई गतिविधि नहीं कर पाता, इस स्थिति में जब मस्तिष्क उस अंग को कोई सन्देश भेजता हैं तो वह अंग उसे receive नहीं कर पाता. इस अवस्था को ही लकवा मारना पैरालिसिस कहते हैं. इसमें रोगी के जिस अंग पर लकवा हुआ हो वह अंग लटक जाता हैं, मानो जैसे की रोगी का वह अंग मर गया हो.

जाने लकवा का आयुर्वेदिक उपचार Paralysis treatment in Hindi at Home

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लकवा में क्या होता हैं डिटेल (क्या हैं पैरालिसिस)

शरीर के स्नायु संस्थान के एक या अनेक तंतुओं की संचालन शक्ति का नाश हो जाने को कोई लकवा मारना कहते हैं. कभी-कभी लकवा पुरे शरीर को ही लग जाता हैं. जिस अंग में लकवा लगता हैं, वह अंग गति-शुन्य हो जाता हैं और धीरे-धीरे सूखने लगता हैं, वह फिर किसी भी काम के लायक नहीं रहता और हिल डुल भी नहीं सकता हैं.

लकवा के नाम : इस रोग का इंग्लिश में सिर्फ एक ही नाम हैं “पैरालिसिस” (paralysis attack). हिंदी भाषा में इसे निम्न नाम से जाना जाता हैं जैसे – पक्षाघात, पक्षवध, फालिज.

अगर हम कहें की वस्तुत: "लकवा स्वयमेव कोई रोग नहीं होता" तो यह गलत न होगा, क्योंकि साधारणता: मस्तिष्क, रीढ़ और किसी स्नायुविशेष के रोग से ही विभिन्न प्रकार का लकवा उत्पन्न होता हैं. जब किसी रोग द्वारा ये सब स्नायु-केंद्र या स्नायु विकृत हो जाते हैं तो उनके अधीनस्थ अंग में जड़ता आ जाती हैं. यही लकवा हैं. (पैरालिसिस) लकवा और कुछ नहीं, यह केवल मस्तिष्क आदि यन्त्र की रोगग्रस्त अवस्था का एक लक्षण मात्रा होता हैं. यही कारण हैं की प्राकृतिक चिकित्सा में जिस स्नायुकेन्द्र के रोग से यह लक्षण उत्पन्न होता हैं, साधारणता: उसी का Treatment किया जाता हैं, न की लक़वारूपी लक्षणों का paralysis ayurvedic treatment.

लकवा कैसे लगता हैं, क्या होता हैं इसकी प्रक्रिया जाने

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मस्तिष्क हमारे शरीर का केंद्र हैं. शरीर के सभी कार्य उसी के आज्ञानुसार होते हैं. शरीर के सभी अंग का हिलना डुलना इसी अंग पर निर्भर करता हैं. मस्तिष्क का अगला और प्रमुख भाग सेरेब्रम (Cerebrum) कहलाता हैं, जिसके दाएं और बाए, दो बराबर भाग (गोलार्ध) होते हैं, जिन्हें सेरेब्रल (Cerebral Hemisphere) कहते हैं.

दाया गोलार्ध शरीर के बाए अंगों को सुचारु रूप से रखने के लिए जिम्मेवार रहता हैं. और बायां गोलार्ध दाए अंगों के लिए. जब कभी हमे कोई अंग चलाना होता हैं, जैसे दाए हाथ से एक बाल्टी उठानी हैं यानी हमे हाथ की मुट्ठी बांधना हैं, जिससे हम बाल्टी को पकड़ सकें तो सबसे पहले मस्तिष्क के बाये सेरेब्रल गोलार्ध से आज्ञा मिलती हैं. यह आज्ञा एक सन्देश (Impulse) के रूप में मस्तिष्क में सुषुन्मा स्नायु में जाती हैं.

यह सन्देश मस्तिष्क से सुषुन्मा स्नायु तक मस्तिष्क के अंदर स्थित स्नायु-तंतुओं (Nerve fibers) से होकर जाता हैं, जिसे पिरॅमिडल तंतु (pyramidal fibers) कहते हैं. सुषुन्मा स्नायु से सन्देश मोटर स्नायु (Motor Nerve) द्वारा इन मांसपेशियों के पास जाता हैं, जिनके संकुचन से दाए हाथ की अंगुलियां मुड़ती हैं.

सन्देश पाने पर संबंध मांसपेशियां संकुचित होती हैं. फलस्वरूप मुट्ठी बंद हो जाती हैं. बायें सेरेब्रल गोलार्ध से जो पिरॅमिड्ल तंतु सुषुन्मा स्नायु को जाते हैं, वे सुषुन्मा स्नायु से पहले ही मेडुला ओबलानगेटा में दायी तरफ मूड जाते हैं. इसी तरह दाये गोलार्ध से चलने वाले तंतु बायीं तरफ मूड जाते हैं. यही कारण है की सेरेब्रल गोलार्ध शरीर के दाए अंगों के और दाये गोलार्ध बायें अंगों के संचालन पर नियंत्रण रखता हैं.

अगर किसी बीमारी के कारण मस्तिष्क अपने आदेश शरीर के अंगों को नहीं भेज पाता हैं, तो इस अवस्था में शरीर के अंग हिल-डुल नहीं सकते और वे बेकार हो जाते हैं. इसी अवस्था को लकवा लगना या फालिज गिरना कहते हैं.

शरीर के सभी अंगों की तरह मस्तिष्क को भी धमनियों द्वारा रक्त रूप में पोषण मिलता रहता हैं. जब कभी मस्तिष्क की धमनी की नली में कोई रुकावट पड़ जाती है तो मस्तिष्क को रक्त नहीं मिल पाता. उस स्थिति में मस्तिष्क का वह भाग बेकार हो जाता हैं, जितने भाग में उस धमनी द्वारा मस्तिष्क का पोषण होता हैं यानी मस्तिष्क का वह भाग शरीर के अंगों को अब अपने आदेश नहीं भेज पाता. फलवरूप शरीर के वे अंग हिल डुल नहीं सकते.

बायां सेरेब्रल गोलार्ध शरीर के दाये अंगों पर और बायां गोलार्ध बायें अंगों पर अपना नियन्त्र रखता हैं. शरीर के जिस तरफ के अंग बेकार हो जाते हैं, लकवा लगने की वजह उसके दूसरे तरफ की धमनी में होता हैं.

तो दोस्तों यह तो रही “लकवा लगने की प्रक्रिया” अब हम बात करते हैं – वह कौन-कौन सी आदते व शारीरिक समस्याए हैं जो की लकवा पैरालिसिस रोग को जन्म देती हैं paralysis attack info in Hindi.

इन वजहों से लगता हैं लकवा

  • मिर्गी का रोग होने से भी लकवा हो जाता हैं
  • हिस्टेरिया रोग से भी पैरालिसिस हो सकता हैं
  • मूत्रपिंड के रोग से
  • बुढापे में, यानी शरीर के कमजोर होने से भी इसकी आशंका होती हैं
  • किसी भी आकस्मिक घटना के होने से
  • एक दम ज्यादा खुश होने से या एक दम कोई बड़ा दुःख होने से
  • अत्यधिक मानसिक श्रम, जैसे ज्यादा सोच विचार चिंतन करना
  • धातुक्षीणता
  • रक्ताल्पता (खून की कमी)
  • मस्तिष्क में किसी तरह की घातक चोट लगने से
  • सिर में अधिकतर दर्द बने रहने से
  • रक्त-वाहिनियों (खून की नसें) और स्नायुन के दूषित हो जाने से
  • विष प्रकोप अथवा विषैले तत्वों का शरीर में प्रवेश हो जाने से
  • जरुरत से ज्यादा व्यायाम करने से
  • रक्तचाप की अधिकता (Blood pressure)
  • अपनी शारीरिक सामर्थ्य से अधिक परिश्रम करना
  • स्नायु रोग या धमनी में कोई रोग होने से
  • गठिया रोग
  • स्नायु संस्थान की विकृति होने से
  • रात में ज्यादा देर तक जागने से
  • सीधे ठण्ड सहने से या बारिश के पानी में ज्यादा रहने से

यह रहे सभी कारण जिनकी वजह से पक्षाघात की घटना घटती हैं. इसमें सबसे सामान्य हैं ब्लड प्रेशर, अभी के समय में ज्यादातर रोगियों को इसी वजह से लकवा मारता हैं.

अब जानिये लकवा लगने से पहले व्यक्ति में क्या क्यां लक्षण नजर आने लगते हैं. (इन लक्षणों को पढ़कर आप किसी भी व्यक्ति को लकवा पैरालिसिस रोग होने से बचा सकते हैं). इसे आप फर्स्ट ऐड भी कह सकते हैं, यह सभी निशानियां आम लकवे ग्रस्त व्यक्ति को लकवा होने से पहले देखने को मिलते हैं (लकवा का रामबाण इलाज व उपाय)

लकवा लगने से पहले व्यक्ति में दिखाई देने लगती हैं यह हरकते

  • जिस अंग पर लकवा लगने को होता हैं, उस अंग के स्नायु शिथिल पड़ जाते हैं.
  • मन में उत्साह नहीं रहता. काम करने की रूचि भी नहीं होती
  • सीढ़ी चढ़ने में परेशानी और कष्ट होता हैं
  • दिमाग की गर्मी से परेशानी होती हैं
  • रक्तचाप में वृद्धि हो जाती हैं
  • जिद्दीपन, झक्की स्वाभाव और उदासी आ जाती हैं
  • भूख, नींद और काम शक्ति घट जाती हैं
  • शरीर में कोई भाग झनझनाने लगता हैं. उसमें खुजलाहट होने लगती हैं
  • जिस और लकवा मारने वाला होता हैं, उस और की नाक विशेष रूप से खुजलाती हैं
  • जिस और लकवा मारने को होता है, उस और की स्पर्श शक्ति कम पड़ जाती है या एक दम बढ़ जाती हैं
  • कब्ज हो जाता हैं
  • गठिया, वात-विकार अपना अड्डा जमा लेते हैं
  • स्नायुवात एवं सुषुन्मा विकार बढ़ जाता हैं
  • अंग में शून्यता, अचलता में आ जाती है

आदि यह सभी निशानिया व रोग उस व्यक्ति में दिखने लगते हैं जिसको भविष्य में लकवा रोग होने वाला हो. अतः आप इन्हें पहचान कर अपनी और दुसरो की मदद कर सकते हैं. अब हम बात करते हैं लकवा कितने तरह के होते हैं ? इस बारे में.

पैरालिसिस के प्रकार – (लकवा का इलाज घरेलु नुस्खे व उपाय)

वैसे तो लकवा के कई प्रकार हैं, लेकिन इसके आम 20 प्रकार होते हैं, जो की ज्यादातर व्यक्तियों को होते हैं. आइये जाने इन प्रकारो के बारे में.

1. अर्धांग का लकवा (Hemiplegia paralysis) – जब लकवा शरीर के आधे हिस्से यानी शरीर के दाए या बाए तरफ लगता हैं, तो उसे अर्धांग का लकवा कहते हैं. इसका प्रभाव एक तरफ के हाथ, पैर, मुंह, जिन्हे आदि अंगों पर होता हैं. यानी शरीर के आधे हिस्से में लकवा मारना. (एक साइड तरफ का one sided paralysis).

2. एकांग का लकवा (Monoplegia paralysis) – लकवा लगने पर जब रोगी का केवल एक हाथ एक पैर बेकार हो जाता हैं तो उसे एकांग का लकवा कहते हैं.

3. पूर्णांग का लकवा (Quadriplegia Or Diplegia paralysis) – जब किसी के दोनों हाथ और दोनों पैर बेकार हो जाते हैं, तो उसे पूर्णांग का लकवा कहते हैं. आयुर्वेदा में निम्नांग का लकवा, मेरुमज्जा, प्रदाहजन्य लकवा, अर्धांग का लकवा तथा बाल लकवा को पूर्णांग लकवा के ही जैसे माना जाता हैं. इसे चार भेदों के रूप में माना गया हैं.

4. निम्नांग का लकवा (Paraplegia paralysis) – यह शरीर के निचले आधे भाग, यानी कटी-प्रदेश से पैरों की अंगुलियों तक का लकवा हैं. अगर आपको निम्नांग का लकवा हैं तो आप इसके बारे में पूरी जानकारी जरूर पड़ें – यहाँ देखे – निम्नांग का लकवा.

5. सकम्प लकवा (Parkenson’s Disease paralysis) – यह प्रौढ़ावस्था की क्षीणता के कारण होता हैं, इसमें मस्तिष्क के तंतु क्षीण होने लगते हैं, जिससे शरीर में धीरे-धीरे कड़ापन बढ़ने लगता है. सकम्प लकवा के बारे में ओर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करे – सकम्प लकवा.

6. मेरुमज्जा-प्रदाहजन्य लकवा (Myelitis paralysis) – इस तरह का लकवा उपदंश ग्रस्त रोगियों को या अधिक भोग विलास करने वालों को अधिक वीर्यक्षय हों जाने के कारण होता हैं.

7. बाल-लकवा (Infantile Paralysis) – यह भी मेरुमज्जा प्रदाहजन्य रोग है, यह रोग 6-7 माह की आयु से लेकर 3-4 वर्ष के बच्चों को हो जाता हैं. इसमें पहले तेज ज्वर आता हैं. बाल लकवा के कारण लक्षण के बारे में यह जानकारी जरूर पड़ें – बच्चों का लकवा Infantile Paralysis in hindi 

8. स्वरयंत्र का लकवा (Vocal Cord’s paralysis) – गले के भीतर स्वर नली होती हैं. जब उस स्वर नली में लकवा लगता हैं तो मनुष्य का बोलना पूरी तरह बंद या थोड़ा कम हो जाता हैं. इसी को स्वरयंत्र का लकवा कहते हैं.

9. जिबान का लकवा (Bulbar Paralysis or Aphasia paralysis) – जब वाणी की वाहक शिराओ में लकवा मार देता है, तो जीभ अकड़ जाती हैं. तब बोलने में तकलीफ होती हैं और मनुष्य बोलते वक्त तुतलाने लगता हैं. जीभ के लकवे के बारे में यह भी जरूर पड़ें – जीभ का लकवा – Tongue Paralysis in Hindi

10. मुखमण्डल का लकवा (Facial paralysis) – इसमें मुखमण्डल के एक तरफ का भाग जड़ होकर घूम जाता हैं. मुख्यद्वार का एक और का कोना निचा दिखने लगता हैं, एक तरफ का गाल ढीला हो जाता हैं व होंठों से थूंक गिरता रहता हैं. मुंह के लकवे के बारे में ओर पढ़ने के लिए यह जरूर पड़ें – मुंह का लकवा – Facial Paralysis Treatment in Hindi

11. अंगुलियों का लकवा (Writer’s paralysis) – अपने हाथ की अंगुलियों से बहुत ज्यादा काम करने वालों की अंगुलियों को लकवा अक्सर होते देखा गया हैं. इस तरह के लकवे का एक नाम लेखक का लकवा इसीलिए रखा गया हैं. लेखन का काम करने वालों के अलावा सुई काम करने वालों, केरूसिये का कर्म करनेवालों, तूलिका का काम करने वालों तथा हाथ से काम करने वाले जुलाहे, चित्रकारों को भी यह रोग हो सकता हैं. इस तरह के लकवे का आरम्भ दाहिने हाथ के अंगूठे से होता हैं या तर्जनी अंगुली से. उसके बाद धीरे-धीरे समूचे हाथ की अंगुलियों पर इसका प्रभाव हो जाता हैं, जिसके परिणामस्वरूप लिखते समय, सुई का काम करते समय तथा चित्र आदि बनाते समय हाथ की अंगुलियां कांपने लगती हैं और काम नहीं हो पता हैं.

12. पेशी-क्षय- जन्य लकवा (Wastery paralysis) – इसमें मेरुदंड मज्जा प्रदाह के कारण आक्रांत भाग की मांसपेशियां धीरे-धीरे दुर्बल होकर सूखती जाती हैं. इस रोग का आक्रमण धीरे-धीरे सबसे पहले हाथ के ऊपरी भाग अंगूठा पर होता होता हैं. वहां पहले थोड़ी देर दर्द होता रहता हैं, फिर वहां भी मांसपेशियों की अनुभव करने की शक्ति कम होने लगती हैं. तत्पश्यात रोग अन्यान्य उपद्रवों के साथ समस्त शरीर में फैलने लगता हैं.

13. डिप्थीरिया जन्य लकवा (Deptheric paralysis) – डिसपतिरिया के रोग बच्चे के गलत उपचार के परिणामस्वरूप यह रोग होता हैं, जो उसके लिए बड़ा कष्टदायक सिद्ध होता हैं.

14. हिस्टिरया जन्य लकवा (Hystrical paralysis) – हिस्टिरया की पुराणी रोगी स्त्रियों को उनके शरीर के स्नायुओं में विकृति होने के कारण इस प्रकार का लकवा हो जाता हैं.

15. पारद दोष जन्य लकवा (Mercurious paralysis) – यह पारद द्वारा किसी रोग की चिकित्सा किये जाने का भयानक दुष्परिणाम होता हैं.

16. सीसा जन्य लकवा (Lead palsy paralysis) – यह रोग सीसा धातु द्वारा किसी रोग की चिकित्सा किये जाने का कुफल होता हैं.

17. गठिया जन्य लकवा (Rhumatic paralysis) – गठिया रोग जब गलत उपचार के फलस्वरूप पुराना और जटिल हो जाता हैं तब रोगी के शरीर के स्नायुपुज्ज में अस्वाभाविकता आ जाती हैं और वे शिथिल एवं अक्रिय हो जाते हैं. यही गठिया जन्य लकवा होता हैं.

18. आंशिक त्वक शून्यता (Partial paralysis) – जब शरीर के किसी भाग का चर्म शुन्य पड़ जाता हैं और वहां चींटी या चुटकी काटने पर भी दर्द नहीं होता तो उसे आंशिकतवक शून्यता या लकवा कहते हैं.

19. हाथ के ऊपरी भाग का लकवा (Erbs paralysis) – इसको बाजू का लकवा भी कहते हैं. इसमें कुहनी से लेकर कंधे तक के भाग में लकवा लग जाता हैं.

20. रक्तचाप जन्य लकवा (Hypertention Haemoralegla paralysis) – रक्तचापाधिक्य के रोगी की चिकित्सा जब उत्तेजक और विषैली औषधियों द्वारा अधिक समय तक होती हैं तो उसके परिणामस्वरूप उसकी जीवनी शक्ति अती दुर्बल हो जाती हैं. उसके शरीर का स्नायु संस्थान भी छिन्न भिन्न हो जाता हैं. तभी इस प्रकार के लकवे का आक्रमण उसके शरीर पर होता हैं.

पूछे खुद से मुझे लकवा किस वजह से हुआ ??

किसी भी स्नायु रोग, विशेषतः लकवा का आयुर्वेदिक उपचार आरम्भ करने से पहले लकवा क्यों हुआ, इसके कारणों को ढूंढ निकालना चाहिए. आधुनिक विज्ञानं के आधार पर रक्त की जांच करनी चाहिए तथा रोग परीक्षा के सम्बन्ध में और भी जरुरी चीजें जाननी हों, जान लेनी चाहिए. इन सब बातों की जानकारी प्राप्त कर लकवा का इलाज करने में आसानी होती हैं paralysis attack treatment in hindi.

उदाहरण के लिए जैसे – लकवा में यदि मूर्छा के साथ रक्चाप में वृध्दि है तो रक्तचाप को कम करने का उपाय करने से रोगी को लाभ होगा. रक्तचाप के कम होते ही रोगी की मूर्छा दूर हो जायेगी. अगर मूत्र में शर्करा आती हैं तो उसे दूर करने से रोगी का भला होगा और तुरंत इलाज होगा यानी जल्दी से लकवे में सुधार नजर आएगा. इसलिए किसी भी रोग का ट्रीटमेंट करने से पहले वह किस वजह से हुआ हैं उस बारे में जरूर जानलेना चाहिए.

Hint : 1 अगर चींटी के काटने या सामान्य चुटकी काटने से ही लकवा के रोगी को बोध हो जाय, तो उसे मामूली इलाज से ही लाभ हो जायेगा, ऐसा समझना चाहिए.

Hint : 2 लकवा लगते ही रोगी को सब काम धाम छोड़कर पूर्ण मानसिक एवं शारीरिक विश्राम हेतु चारपाई पर आराम से लेट जाना चाहिए और कुशल चिकित्सक को भार सौंप देना चाहिए.

Hint : 3 बोलने का काम करने वाले की जबान जब बोलते समय लड़खड़ाने लगे तो उसे फ़ौरन बोलना बंद कर देना चाहिए और एक गिलास ठंडा पानी पि लेना चाहिए. केवल इतना ही करने से वह मुँह के लकवे से बच सकता हैं.Tips for face paralysis treatment in Hindi में.

Hint : 4 लकवा की बीमारी में रोगी की अंगुलियां को चटकाने से अगर वे आसानी से चटक जाए तो समझना चाहिए की ऐसा रोगी शीघ्र ही ठीक हो जाएगा. अगर अंगुलियों के पूर्वे भी चटक जाए तो रोगी केवल मालिश से ही निश्चित रूप से ठीक हो जाएगा.

तो दोस्तों अब हम बात करते हैं लकवा का आयुर्वेदिक उपचार के बारे में, यहां हम सभी तरह के उपाय बताएंगे आयुर्वेदिक (ayurveda) प्राकृतिक (natural treatment) इन दोनों को अपनाकर आप तेजी से अपने रोग को मिटा सकते हैं. साथ ही यह भी जरुरी हैं की आप लकवा का उपचार इन हिंदी में करने के साथ साथ डॉक्टरी ट्रीटमेंट भी करवाते रहे. क्योंकि लकवा ऐसा रोग हैं जो ठीक होने में सालों का समय भी ले लेता हैं, इसलिए जरुरी हैं की हम हर तरह व हर तरफ से पैरालिसिस का इलाज करने से न चुके. तो चलिए अब हम आगे बढ़ते हैं.

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लकवे का आयुर्वेदिक उपचार – Paralysis Ayurvedic Treatment in Hindi

51+ Home Remedies 

वृहत वात चिंतामणि का रस 

शरीर का कोई भाग या दायी तरफ से लकवा मार गया हो तो, ऐसे रोगी को “वृहत वात चिंतामणि” का रस लेना चाहिए. इसमें बहुत ही छोटी-छोटी गोलियां होती हैं. इन गोलियों को लकवाग्रस्त व्यक्ति सुबह व शाम एक गोली शुद्ध शहद के साथ लें, यह दायी तरफ के अंग के लकवा का आयुर्वेदिक उपचार हैं. इस गोली को एक चम्मच में रखकर हाथ से या किसी ठोस चीज से इसे बारीक कर दें, इसके बाद इसी चम्मच में शहद मिलाकर, अच्छे से घोलकर छाट लें.

वीर योगेंद्र रस

और अगर किसी व्यक्ति को बायीं तरफ से लकवा मार गया हो तो उसे वीर योगेंद्र रस का सेवन करना चाहिए. इसमें भी छोटी-छोटी गोलियां निकलती हैं, जिसको सुबह व शाम दोनों समय शुद्ध शहद के साथ लेना होता हैं. इस गोली को भी चम्मच में रखकर बारीक कर लें व शहद डालकर चाटें.

शहद, अकरकरा और राई का घरेलु नुस्खा

शहद, अकरकरा और राई इन तीनो को 6-7 ग्राम की मात्रा में लेवे, अब राइ और अकरकरा इन दोनों को अच्छे से कूट पीस लें व इसके बाद इन्हें कपडे से छान लें (कपड़छान). अब इसमें शहद भी मिला दें. इस आयुर्वेदिक नुस्खे का दिन में करीबन चार बार उपयोग करना हैं. लकवाग्रस्त रोगी की जीभ पर इसे मलते रहिये, जल्द ही आपको लाभ होता दिखाई देने लगेगा.

सिर्फ यह तीन फल खाने से ही हो जाता हैं लकवे का इलाज (आयुर्वेदिक)

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आगरा के एक वैध का कहना है की लकवा की बीमारी का इलाज तीन फलों से किया जा सकता हैं. वे हैं सेब, अंगूर और नासपाती. लन्दन के उपनगर में रहने वाली कुमारी विर्क नामक उक्त वैद्य की एक रोगिणी को 7 वर्ष की उम्र में ही लकवा लग गया था. उसके दोनों पैर बेकार हो गए थे. उसके पिता ने जो देश के बंटवारे के पहले भारत के एक जिले में डिप्टी कलेक्टर थे, एक पत्र में उस वैध को लिखा –

“विर्क का सभी तरह का इलाज किया गया, लेकिन वह चलने फिरने के लायक न हो सकी! चूंकि आपमें मेरा पूरा विश्वाश है, इसलिए आप ही उसके लिए कोई आयुर्वेदिक उपचार दवा बता दीजिये.”

वैध ने उनकी बेटी को यह तीन फल सेब, अंगूर, नासपाती का रस पिने को बताया. इन तीनो फलों के रस ने अपना चमत्कार दिखलाया. तीन महीने बाद विर्क ने चलना फिरना शुरू कर दिया. उसके पिता ने वैध को लिखा की लन्दन में इस लकवे की बीमारी का आयुर्वेदक इलाज पर बड़ा आश्चर्य हुआ हैं.

फलों का रस और विटामिन बी

वैध ने इस लड़की पर हुए इन तीन फलों के आश्चर्यजनक प्रभाव के बारे में संवादाता को बताया की लकवे की बीमारी से छुटकारा पाने के लिए सेब, अंगूर और नासपाती के रसों को बराबर मात्रा में मिलाकर पीना चाहिए.

लकवे के रोगी को विटामिन्स बी वाले खाद्य पदार्थ दूध, दही, मट्ठा, मक्खन, लहसुन, परवल, पेठा, बेंगन, केले का फूल, करेला, जमींकन्द, अदरक, पक्का आम, पक्का पपीता, शरीफा, कच्चा नारियल, सूखे मेवे, मधु, मेथी का साग, बथुआ, प्याज, तुरई, लौकी, टिंडा, शलजम, फालसा, अंजीर, गरम पानी पुराने चावलों का मांड, आलुकुलथी को उबालकर उसका पानी, खजूर, मूंग की दाल का सुप आदि विशेष रूप से लाभदायक होते हैं.

लकवा की लहसुन से इलाज (Garalic Ayurvedic treatment for paralysis)

मोटी गांठेवाला रस से भरपूर एक पोटवाला ताज़ा लहसुन लें. उसमें 3-7 कलियाँ हो और उसका वजन 3-7 माशा तक हो. उसका छिलका उतार दें. फिर उसके गुदा को खरल में डालकर महीन चटनी की तरह पीस लें. उसके बाद गाय का दूध लेकर थोड़ा गरम कर लें. दो तोला दूध अलग निकालकर उसमें मधु मिला दें. जब दूध थोड़ा ठंडा हो जाए तो उसमें पिसा हुआ लहसुन मिला दें और चम्मच से हिलाकर रोगी पि जाए. उसके बाद इच्छानुसार दूध पिए.

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खोलते दूध में लहसुन या मधु कभी न मिलाया जाये. दिन में दो बार सुबह और शाम उपयुक्त प्रयोग करें. तीन दिन बाद मात्रा आधा तोला तक कर दें. एक सप्ताह बाद पौन तोला से एक तोला कर दें. आगे इस तरह मात्रा बढ़ाकर ढाई तोला तक कर सकते हैं. फिर इसी प्रकार धीरे-धीरे घटाते जाए. इससे लकवा का प्रभाव धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगा.

जिस लकवा में रक्तचाप अधिक हो, उसमें यह प्रयोग लकवा का रामबाण इलाज सिद्ध होता हैं. इसका प्रयोग एक महीने से 6 महीने तक किया जा सकता हैं. पित्त-प्रकृतिवाले लहसुन की मात्रा थोड़ी कम करके लें. इसके प्रयोग से लाभ ही लाभ होगा. इसे लकवा की लहसुन चिकित्सा यानी लहसुन से लकवा पैरालिसिस का इलाज कहते है.

दूध और लहसुन का प्रयोग

थोड़ा दूध लें व 25 ग्राम छिला हुआ लहसुन लें. अब लहसुन को अच्छे से पीसकर दूध में डालकर उबालें. इसे तब तक उबालते रहे जब तक यह गाढ़ा न हो जाए. जब यह गाढ़ा हो जाए तो उतारकर इसके ठंडा होने का इंतजार करे व फिर इसको खाली लें लकवे की बीमारी के (पैरालिसिस) में यह आयुर्वेदिक उपचार बहुत फायदा करेगा.

15 ग्राम शहद लें और लहसुन की 6-7 कलियां लें. इसके बाद लहसुन (garlic) की कलियों को बारीक पीसलें व शहद में मिला दें. अब इस नुस्खे का दोनों समय सुबह शाम को सेवन करे. लकवा में लाभ होगा.

उड़द और सोंठ का सरल प्रयोग

अब जो नुस्खा हम बताने वाले हैं, यह कई लकवा से पीड़ित मरीजों द्वारा आजमाया जाता हैं. उड़द और सोंठ को किसी बर्तन में डालकर इसमें पानी मिला दें, व अब थोड़ी देर तक इसे अच्छे से उबाले. फिर बाद में इसका पानी पीना चाहिए. इसका लगातार प्रयोग करते रहने से लकवे में लाभ होता हैं.

जिन व्यक्तियों को लकवे की बीमारी होने का डर हैं, वह सभी तुलसी के पत्तों की माला बनाकर कमर में बांध लें, ऐसा करने से पक्षाघात लकवा होने की सम्भावना कम हो जाती हैं.

पैरालिसिस का इलाज करने के लिए काढ़ा (आयुर्वेदिक)

अब हम आपको (paralysis treatment) पैरालिसिस इलाज के लिए काढ़ा के बारे में बताने वाले हैं. कौंच के बिजे लें, उड़द लें, बला, हींग, सेंधा नमक और अरंड की जड़ लें. इन सभी को सामान्य मात्रा में लेकर काढ़ा बनाये व फिर लकवाग्रस्त व्यक्ति को इसका सेवन करवाए पक्षाघात का इलाज इस काढ़े से बहुत अच्छे से होता हैं, ऐसा माना जाता हैं की इस उपाय से रोगी के हाथ पैर काम करने लग जाते हैं.

घरेलु नुस्खे की गोली बनाये

गंधा, बहेड़ा, हरड़, अरंड का तेल और शुद्ध गुग्गुल इन सभी को सामान्य मात्रा में लेकर अच्छे से बारीक कूट पीस लें. कूटपीसकट इनकी बारीक गोलियां बनाये व दिन में तीन बार रोगी को एक गोली गरम पानी के साथ दें. पक्षाघात में यह आयुर्वेदिक उपचार बड़ा लाभ देगा (पैरालिसिस ट्रीटमेंट).

दूध, दालचीनी, सोंठ का उपयोग

 

दूध, दालचीनी, सोंठ – सबसे पहले दूध में करीबन एक चम्मच सोंठ मिलाये इसके बाद इसमें थोड़ी सी दालचीनी भी मिलाये. अब इसे आग पर अच्छे से उबाल लें. अच्छे से उबल जाने के बाद इसे कपडे से छान लें व फिर इसमें शुद्ध शहद मिलाकर पिए, लकवा की बीमारी में आराम मिलेगा.

लकवा की मालिश के लिए तेल (Paralysis Oil)

अब हम आपको लकवा ग्रस्त अंग पर मालिश करने के लिए उपाय बता रहे हैं. तिल्ली का जो तेल होता हैं वह लीजिये और उसमे थोड़ी सी मात्रा में कालीमिर्च पीसकर लकवाग्रस्त अंग पर मालिश करे. इसके साथ ही आप सरसों का तेल लें व इसमें धतूरे का बीज पकाकर लकवा ग्रस्त अंग पर मालिश करने से भी आराम मिलता हैं. इन दोनों उपाय में से जो आपको आसान लगे उसका प्रयोग कर सकते हैं.

लकवा के लिए मालिश – 11 ग्राम उड़द की दाल, 5 ग्राम अदरक (पीसी हुई) और 50 ग्राम सरसों का तेल इन सभी को मिलाकर एक बर्तन में डाल दें व आग पर रख कर गरम कीजिये. जब यह अच्छे से गरम हो जाए तो इसमें दो ग्राम कपूर का चुरा भी डालिये. अब लकवा की मालिश के लिए तेल तैय्यार हो चूका हैं. इस तेल को गुन-गुना होने पर शरीर में जहाँ कहीं भी लकवा लगा हो उस अंग पर इसकी मालिश करनी चाहिए.

सरसों का तेल और धतूरे के बीज दोनों को लेकर कम आंच में अच्छे से पका लें. व बाद में इसे छानकर शरीर में जिस अंग पर paralysis का अटैक हुआ हो उस अंग पर मालिश करे. इसके साथ ही बादाम का तेल, निर्गुन्डी का तेल आदि से भी लकवाग्रस्त अंग पर मालिश करना चाहिए.

लकवा के लिए लेप ऐसे बनाये

लकवा के लिए लैप – कड़वा तेल लें करीबन 250 ग्राम, अब इसमें करीबन 50 ग्राम कालीमिर्च डाले व अच्छे से पकाये. जब यह अच्छे से पक जाए तो इस तेल को लकवाग्रस्त अंग पर लगातार 30 दिनों तक मालिश करना हैं.

तांबे के बर्तन का पानी पिए

रोजाना रात को सोने से पहले एक तांबे के बर्तन या तांबे के जग में पानी भरकर रखे व सुबह उठने के तुरंत बाद ही इस पानी को पिले. इस तरह नियमित रूप से लकवाग्रस्त रोगी को तांबे के बर्तन का पानी पीते रहने से पैरालिसिस लकवा में बहुत लाभ होता हैं. साथ ही रोगी की पाचन शक्ति, ब्लड प्रेशर आदि संतुलित होते हैं.

गाय का शुद्ध घी का उपयोग

लकवा के इलाज में गाय का शुद्ध घी भी बहुत ही उपयोगी होता हैं. लकवा के रोगी को शुद्ध गाय के घी की 2-3 बूंदे अपनी नाक में डालना चाहिए. यह किसी भी तरह से हानिकारक नहीं हैं. बल्कि इस उपाय को आजमाने से और भी कई रोग ख़त्म हो जाते हैं. इसका रोजाना प्रयोग करिये.

तुलसी के पत्तों का प्रयोग करे (आयुर्वेदिक)

तुलसी आयुर्वेदिक उपचार (ayurvedic treatment Hindi) के लिए बहुत ही प्रसिद्द औषधि हैं. लकवा की बीमारी में तुलसी की भांप देने से बहुत लाभ होता हैं. भांप के लिए सबसे पहले एक बर्तन में पानी डाले व उसमे तुलसी के पत्ते भी डालें. इसके बाद इस लम्बे समय तक अच्छे से उबाल दें. जब यह अच्छे से उबल जाए तो रोगी को इस पानी की लकवाग्रस्त अंग पर भांप देना चाहिए.

लकवा की कमजोरी को दूर करने के लिए

लकवा की बीमारी में मरीज की हालत काफी कमजोर हो जाती हैं, इसलिए लकवा के दिनों में मरीज को रोजाना शुद्ध शहद का सेवन करना चाहिए. इसके लिए करीबन 55 ग्राम शहद रोजाना दो महीने तक खाये. मरीज की हालत अच्छी होगी, कमजोरियां दूर होंगी.

लकवा का रामबाण इलाज हैं कलोंजी

कलोंजी के तेल को लकवा का रामबाण इलाज माना जाता हैं. प्रयोग के लिए आप सबसे पहले कलोंजी के तेल को हल्का सा गर्म कर लें व फिर लकवाग्रस्त अंग पर इस तेल से मालिश कीजिये. इस मालिश को आप दिन में तीन बार कीजियेगा एक महीने के अंदर आपको परिणाम दिखाई देने लगेंगे.

करेले का सेवन देगा बहुत लाभ

रोगी को करेला का रस, करेला की सब्जी आदि का नित्य सेवन करना चाहिए. क्योंकि करेला में ऐसे कई गुण होते हैं जो की लकवे का इलाज में बहुत ही लाभ देते हैं. इसके साथ ही रोगी को प्याज भी खाते रहना चाहिए.

Paralysis Attack First Aid Treatment in Hindi

अब हम आपको लकवा का प्राथमिक उपचार के लिए उपाय बता रहे हैं (Paralysis attack first aid treatment). जैसे ही किसी व्यक्ति को (पैरालिसिस) लकवा लगे तो जल्द ही 50 ग्राम तिल का तेल पि लेना चाहिए व इसके साथ ही कच्चे लहसुन को दांतों से चबाकर खाना चाहिए. व पैरालिसिस अटैक आने के बाद ही जिस अंग पर प्रभाव हुआ हो उसकी सिंकाई करिये व अपने सिर की सिंकाई भी करिये.

लकवा लगने के बाद ही 6 कली लहसुन की अच्छे से बारीक पीसकर शहद के साथ चाटने से भी आराम मिलता हैं. इस प्रयोग को लकवा लगने के 30 दिन बाद तक करते रहना चाहिए.

लकवा में इस तरह करे मालिश

लहसुन के तेल से लकवा के रोगी के शरीर की मालिश करनी चाहिए यह पैरालिसिस का इलाज में बहुत लाभदायक भूमिका निभाती हैं. मालिश धीरे-धीरे करनी चाहिए, जोर से नहीं. जोर से मालिश करना इसे रोग में हानिप्रद होता हैं. रोगी की हड्डियों पर मालिश नहीं करना चाहिए. स्नायुओं पर हलके हाथ से पर्याप्त समय तक मालिश करनी चाहिए, इससे लकवे की बीमारी में बहुत लाभ होगा. (नोट: लकवे में किसी भी तेल से मालिश करो बस एक बाद का ध्यान रखे की मालिश को मुलायम हाथों से ही करना हैं, ज्यादा रगड़कर मालिश न करे)

एक तरफ का लकवा (one sided paralysis cure)

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शरीर के एक तरफ के अंग में लकवा लग जाने पर रोगी को रोजाना एक से दो घंटे तक अनुम विलोम प्राणायाम करना चाहिए. अनुम विलोम प्राणायाम एक तरफ का रामबाण इलाज हैं. इससे प्राणायाम से शरीर की नाड़ियां शुद्ध होती हैं, व दोनों मस्तिष्क सही तरीके से काम करने लगते हैं. जिससे जल्द ही शरीर के सारे स्नायुतंत्र फिर से अच्छे से काम करने लगते हैं.

मित्रों यह रहे आयुर्वेदिक उपचार के लिए लकवा का घरेलु उपाय व नुस्खे, अब हम आपको लकवे के लिए प्राकृतिक इलाज के बारे में बताएंगे. इसे भी ध्यान से पड़ें, क्योंकि सिर्फ आयुर्वेदिक इलाज ही आपको राहत नहीं दे सकता, इसके लिए आपको सभी तरह के ट्रीटमेंट करने होंगे. इसलिए जरुरी हैं की एक लकवा ग्रस्त रोगी को इस रोग के बारे में पूर्ण जानकारी हो.

भरपूर मात्रा में पानी पिए

लकवा के रोगी को सादा या नीबू के रस का मिला पानी थोड़ा-थोड़ा करके प्रचुर मात्रा में पिलाना चाहिए. साथ ही काफी दिनों तक उसका पेट एनिमा द्वारा साफ़ करते रहना चाहिए. इन दोनों प्रक्रियाओं से रोगी का शरीर विजातीय द्रव्य से मुक्त हो जाएगा और उसका रोग शीघ्र ही दूर हो जायेगा. रोगी को सामान्य पानी भी पीते रहना चाहिए, और इसके साथ ही लकवे के इलाज में नीबू पानी का सेवन भी मरीज को करना चाहिए. क्योंकि यह नीबू पानी लकवे का आयुर्वेदिक उपचार करता हैं.

एक नोट बनाये, अपनी बीमारी के बारे में लिखे

लकवा पैरालिसिस के रोगी को आयुर्वेदिक या डॉक्टरी चिकित्सा लेने से पहले उसके रोग के बारे में पूरा इतिहास लिख लेना चाहिए. जैसे रोग किस ऋतू में हुआ, रात में हुआ, या दिन में, रोगी किस आयु का है, उसकी शारीरिक, मानसिक, आर्थिक तथा पारिवारिक स्थिति कैसी है, सोते समय, काम करते समय या काम शुरू करते समय कब, कैसे रोग हुआ आदि. इन सब बातों का ज्ञान प्राप्त कर लेने से लकवे की बीमारी के इलाज में बड़ी मदद मिलती हैं.

(इस तरीके के बड़े-बड़े हॉस्पिटल्स में भी अपनाया जाता हैं, ऐसा करने से किसी भी रोग का इलाज बड़ी ही आसानी से किया जा सकता हैं, असल में किसी भी चीज का इतिहास देखलेने पर उसके बारे में काफी कुछ जानकारी हो जाती हैं, यही जानकारी उसको खत्म करने में पूर्ण मदद करती हैं.

उपवास और दूध कल्प

अच्छा हो अगर लकवा के रोगी को प्रारम्भ में दो से चार दिनों तक का उपवास कराया जाये. उपवास तोड़ने के बाद उसे थोड़ा-थोड़ा करके दूध पिलाना चाहिए. दूध की मात्रा रोज बढ़ाते हुए रोज 3 से 4 सेर तक पिलाया जाए. उसे दूध कल्प कराया जाए.

लकवा में इन चीजों से बचकर ही रहे

इस रोग में नमक बहुत कम या बिलकुल न लेना अच्छा होता हैं. आरम्भ में भोजन में अन्न लेना भी ठीक नहीं. लकवा के रोगी को चाय, चीनी, तालीभुनि चीजें, नशे की चीजें, मसाले आदि उत्तेजक खाद्य से परहेज करना चाहिए. उसे ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए.

मानसिक उद्वेगों चिंता क्रोध तथा भय से बचना चाहिए. उसे न तो ठंडा पानी पीना चाहिए और न ठन्डे पानी से स्नान ही करना चाहिए. नया चावल, कुम्हड़ा, गूढ़, भैंस का दूध, उड़द की दाल, घुइया, भिंडी, रतालू, तरबूज, बासी ठंडी, चीजें, रात्रि जागरण, पाखाना-पेशाब रोकना, बर्फ का सेवन आदि इस रोग में वर्जित हैं.

धुप स्नान

लकवा के उपचार के लिए प्रतिदिन लाल कपडा ओढ़कर दो घंटे धुप नाहने के बाद पैरों को गरम जल में रख कर और सिर ठन्डे पानी से भीगा तौलिया लपेट कर 15 मिनट तक घर्षण कटी स्नान लेना चाहिए. लाल कपडा ओढ़ते समय सिर को लाल कपडे से नहीं ढंकना चाहिए, अपितु उस पर ठन्डे पानी से भींगा तौलिया रखना चाहिए.

गर्म ठंडा सेंक

रोगी के मेरुदंड पर प्रतिदिन आधे घंटे तक गरम ठंडा सेंक देकर पीठ से आरम्भ करके पुरे शरीर का तौलिया स्नान देना चाहिए. रात भर के लिए कमर की गीली लपेट भी लगानी चाहिए. सप्ताह में दो बार नमकीन जल का स्नान लेना चाहिए. आक्रांत अंग पर कपडे की उष्णकार पट्टी रोज दो घंटे के लिए रखनी चाहिए.

सूर्यतप्त जल और प्रकाश

रोज पिली बोतल के सूर्यतप्त जल की 4 से 6 खुराकें आधी-आधी छटांक की, पीना चाहिए तथा आक्रांत अंग पर पहले एक घंटे लाल प्रकाश और फिर दो घंटे तक नीला प्रकाश डालना चाहिए.

नमकीन जल स्नान

नाहने के आदमकद टब में सुहाता सुहाता गरम पानी भरिये. उसमें पिसा हुआ सेरभर नमक मिलाइये. फिर नंगे होकर बिस मिनट तक उसमें पड़े रहिये. सिर पानी से बाहर रहे. इसके बाद पानी से बाहर निकलकर सारे शरीर को सूखे कपडे से पोंछकर गरम कपडे पहन लेने चाहिए. यह स्नान आवश्यकतानुसार ताजे, ठन्डे, हलके गरम या गरम पानी से लिया जा सकता हैं.

तौलिया स्नान

इस स्नान के लिए रोगी को लेटाकर उसे एक चादर से ढँक दिया जाए. इसके बाद पहले उसके एक पैर को चार मिनट तक गीले तौलिये से धीरे-धीरे रगड़-रगड़कर साफ़ किया जाए. फिर सूखे तौलिये से पैर को सुखाकर एक मिनट तक हाथ से रगड़ा जाए, ताकि त्वचा में स्वाभाविक गरमी आ जाए. फिर दूसरा पैर लिया जाए. फिर एक-एक हाथ, फिर पीठ और टब पेट तथा छाती. अंत में सिर और मुंह को ठन्डे पानी से धोकर, तौलिये से सूखा दिया जाए.

इस तरह समूचे शरीर को तौलिया स्नान देने में लगभग आधा घंटा लग जाता हैं. यह स्नान ज्वर की अवस्था में या कमजोर रोगी को दिया जाता हैं. इस स्नान को अंग्रेजी में sponge bath कहते हैं. रोगी की शक्ति और मौसम के अनुसार ही जल ठंडा या हल्का गरम कर लिया जाता है.

रंगीन बोतल में सूर्यतप्त जल बनाना

जिस रंग की बोतल का सूर्यतप्त जल बनाना हो, उस रंग की बोतल में साफ़ पानी भरकर डाट लगाकर लकड़ी पर रख कर धुप में रख दें. सूर्योदय से सूर्यास्त तक इस बोतल को धुप में रखना चाहिए. चौबीस घंटे धुप में रहने से सूर्यतप्त जल उपयोग के लिए तैयार हो जाता हैं.

रंगीन बोतल में सूर्यतप्त जल बनाना

जिस प्रकार रंगीन बोतलों में सूर्यतप्त जल बनाया जाता हैं. उसी प्रकार तेल भी बनाया जाता हैं. फर्क इतना ही हैं की इसमें जल की जगह शुद्ध सरसों या तिल का तेल भरकर 24 घंटे के बजाय 40 दिनों तक रोज उसी ढंग से सूर्य के सामने धुप में रखते हैं. 40 दिन तक धुप में रखने के बाद तेल में सौर्य गुण आ जाते हैं. सूर्यास्त होते ही बोतल उठा लेनी चाहिए. रोजाना बोतल को ऊपर से साफ़ कर देना चाहिए.

रंगीन प्रकाश डालना

शरीर के जिस भाग पर रंगीन प्रकाश डालना होता हैं, उस पर सूर्य किरण या लालटेन की रौशनी के बिच रंगीन शीशा रखकर रंगीन प्रकाश डाला जाता हैं.

धुप स्नान

गरम पानी पीकर और नंगे होकर 20 से 30 मिनट तक हलकी धुप में सिर को साये में रखकर लेटने से पसीना निकलने लगेगा. उसके बाद ठन्डे पानी में स्नान कर लेना चाहिए. इस स्नान में सिर को साये में रखना या सिर पर ठन्डे पानी से भीगा तौलिया रखना तथा बिच-बिछे में थोड़ा-थोड़ा पानी पीते रहना जरुरी हैं.

शुष्क घर्षण स्नान या सुखी मालिश

अपनी हथेलियों से शरीर के अंग-प्रत्यंग को, सिर से पैर तक अच्छी तरह और तेजी से इतना रगड़ना चाहिए की समूचे शरीर में लालिमा आ जाए. जांघ और टांगो को रगड़ते समय घुटनो को सीधा और तना रखना चाहिए.

लकवा में उपवास से करे उपचार (Paralysis treatment with fasting in ayurveda)

उपवास के दिनों में केवल जल अथवा कागजी नीबू का रस मिले जल के सिवा कुछ भी खाना पीना नहीं चाहिए. उन दिनों में थोड़ा-थोड़ा करके 2-3 सेर या अधिक पानी रोज जरूर पीना चाहिए. जिस दिन उपवास किया जाए, उस दिन शाम को और फिर उपवास काल में रोज सबेरे या शाम को दिन में एक बार सेर डेढ़ सेर गुन-गुने पानी का एनिमा जरूर लेना चाहिए.

अगर एक दिन का उपवास किया जाए तो दूसरे दिन फल खाने के बाद, तीसरे दिन भोजन किया जा सकता हैं. अगर तीन दिन का उपवास किया जाए तो चौथे दिन केवल फल या तरकारियों का सूप पांचवे दिन फल और छठे दिन सुबह शाम को फल और दोपहर को थोड़ी रोटी और सब्जी लेनी चाहिए. फिर साधारण भोजन पर आ जाना चाहिए. लम्बे उपवास किसी उपवास विशेषज्ञ की देखरेख में ही करना चाहिए.

Lahsun Ka Ek Aur Ayurvedic Prayog Lakwe Ke Liye

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अगर इस जानकारी को लेकर आपके मन में कोई सवाल हैं तो Comment के जरिये हमे बताये. ayurvedic treatment phalij falij paralysis.

उम्मीद करते हैं आपका रोग जल्द ही ख़त्म हो जाए.

मित्रों उम्मीद करते हैं आपको पैरालिसिस लकवा का इलाज इन हिंदी में पढ़कर अच्छा लगा होगा, यहां हमें लकवे का आयुर्वेदिक उपचार (घरेलु) व प्राकृतिक इलाज दोनों ही बताये हैं, साथ ही वह सारी जानकारी दी हैं जो की आपको नेट पर और कहीं नहीं मिलेगी. facial, lips, body paralysis attack treatment in in Hindi अब आप इस लेख को Facebook पर ज्यादा से ज्यादा SHARE करे, ताकि यह सभी जरूरतमंद लोगों तक आसानी से पहुंच सके. पक्षाघात का आयुर्वेदिक घरेलु उपचार इन हिंदी भाषा में. इसके साथ ही लकवा पर हमारे द्वारा लिखे गए अन्य लेख भी पड़ें.

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8 Comments

  1. AMARJEET SINGH
  2. suresh vimal
  3. Gaurav arora
    • BABA
  4. Nilesh mahadik
    • BABA
  5. sankar
    • BABA

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